आज जंतर-मंतर पर जो हुआ, उसने लोकतंत्र के सामने एक असहज सवाल रख दिया है—क्या अपने भविष्य की बात करना भी अब गुनाह बन गया है? जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वे बैरिकेड के सामने खड़े हैं। जवाब में अगर सिर्फ़ बल दिखे, तो यह संदेश जाता है कि सवाल पूछना मंज़ूर नहीं। लेकिन लोकतंत्र में असली ताकत आलोचना से डरने में नहीं, उसे सुनने में है। सरकार की असल परीक्षा विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही युवाओं के सवालों से होती है। उन सवालों का जवाब लाठी नहीं, पारदर्शिता और नीति होनी चाहिए। भाषा तीखी है, लेकिन आरोप तथ्य-आधारित।








